Thursday, October 1, 2009

आसमान है ...

सूर्य के उदय होने की लालिमा
एक नया रंग देती है उस निलय को
एक तारा जो अपना अस्तित्व बताता है
कि मैं हूं वो भी खो जाता है कुछ ही पलों में ।
कई छोर होंगे उस आसमान के,
पर जब देखो एक सा नजर आता है।
सूर्योदय से सूर्यास्त तक रंगो से भरी उसकी दुनिया
रात जिसे काला करती है और तारे आकर फिर चमका जाते हैं।
मौसम आते हैं जाते हैं पर वो ठहरा है
अपने सभी रंग लिए प्रकृति जिसमें सिमट सकती है
पर वो आजाद करता है सभी को
उंचाई में उसका कोई छोर नहीं
लगता है उसका अपना कोई और नहीं
सभी को अपना बना रखा है उसने
क्योंकि वो आसमान है।
कहते हैं खुदा और भगवान उसी में बसते हैं,
फिर भी कोई अभिमान नहीं
वही अपनापन, हमसे दूर कहीं झुकता नजर आता है।
उसके पास है आगे बढ़ने की प्रेरणा
उंचाई के नए मापदंण, व्यक्तित्व में खुलापन
और हर किसी के लिए क्षमाधन
फिर सोचो वो इतराए तो कैसा होगा
दुनिया के अस्तित्व को ही खतरा होगा।
पर वो ऐसा नहीं है वो सहज है,
सरल है वृहद है,
पर अभिमानी नहीं
फिर हम क्यों करते हैं मान
अपने धन प्रतिष्ठा या स्वाभिमान पर
अपने कर्मों पर
जो वो नहीं करता मान
जो आसमान है...




8 comments:

  1. This is very good site ,good creativity done by you.May God fuifill all your dreams.

    Best Of Luck
    Sonika

    ReplyDelete
  2. This is great, Bhumi. Keep it up.
    We journalists, after doing our story, tend to forget it. But what is behind it? Who is playing what games? And most important of all is what and how do we feel about the subject about which we have done our story? Your first writing is like that. Dont do it in a hurry. Think and feel about it and then write. It will become a great piece.
    Hope you will enlighten us all by telling stories behind a story.
    Good luck.
    Rakesh.

    ReplyDelete
  3. यह कविता तो सिर्फ एक बानगी है। भूमि की कविताओं से मैं इससे कहीं ज्‍यादा गहराई से वाकिफ हूं। मुझे आश्‍चर्य भी हुआ था कि भाषा की कहीं कहीं गलतियों और शिल्‍प की कुछ कमजोरी के बावजूद कोई इतना सुंदर और भावुक भाव लोक बुन सकता है। भूमि की कविताओं की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह ऑरिजनल है। उसमें डिजाइन और बनावट नहीं है। बिलकुल भीतर से निकला सीधा सच्‍चा रूप।

    ReplyDelete
  4. आसमान है... एक सुन्दर काव्य से अधिक...
    वृहद् विचार, विस्तृत सोच और तीक्ष्ण तान है...
    विशालता से अधिक, नम्रता का मान है...
    कुछ लोग ज़र्रे कि हैसीयत नहीं रखते, और उन्हें गिरी का अभिमान है
    तुम्हारा ये काव्य नींद से जगादे उन्हें... वो थप्पड़ है..
    अहसास हो जाए उन्हें कि वो उतने बड़े नहीं हैं अभी...
    जितना वो आसमान है....
    हाँ... तुम्हारा ये काव्य खूबसूरत है ...
    उतना ही ... जितना वो आसमान है.

    विजय वर्मा

    ReplyDelete
  5. भूमिका,

    तुमने तो मज़ाक-मज़ाक में बहुत संजीदा कविता लिख दी :)
    कुछ परेशान हो क्या ? :o
    या बस यूँ ही कभी-कभी........
    खैर,
    तुमने अपने जज्बातों को खूब अल्फाज़ दिए हैं,
    बिलकुल तुमसे मेरी उम्मीदों के बरअक्स.

    मेरी जमात में शामिल हो,
    जानकर ख़ुशी हुई.

    ReplyDelete
  6. good good.
    shivesh
    shivvani.blogspot.com

    ReplyDelete
  7. aap apane rachana men proof reading par jyada dhyan de. kaumarya ke bad " hai" nahi lagega."asmita" me chhoti e kee matra lagegi. no daught vishay aur abhivyakti behtar hogi. hamari shubhkamnaye.
    Gopal Prasad(Editor, Samay Darpan)
    www.samaydarpan.com,www.samaydarpan.blogspot.com

    ReplyDelete
  8. It such a nice Blog & U r work type is mind blowing....... Wish u all the Best For u r Bright Fucture......... Rishabh kasbe

    ReplyDelete