Thursday, October 13, 2011

‘जगमग सेना’ और ‘आवाज’ बदल रहे हैं तस्वीर


शिवपुरी से भूमिका कलम
उम्र महज 12 से 18 साल लेकिन हाथों में कलम थामे वे गांव की तस्वीर को बदलने की जिद रखते हैं। गुना जिले के लगभग 50 गांव के 250 से अधिक बच्चे इन दिनों अपने गांव की समस्याओं उनके निदान और उपायों के बारों में बड़ों से भी गंभीर चर्चा कर रहे हैं। इन बच्चों ने बुधवार को शिवपुरी से 20 किमी की दूरी पर तानपुरा के हाईस्कूल में जिला प्रशासन द्वारा आयोजित हाथ धुलाई कार्यक्रम का कवरेज किया। उन्होंने यह तय किया है कि वे अपने अखबार ‘जगमग’ और ‘आवाज’का अगला अंक हाथ धुलाई स्वच्छता पर केंद्रीत करेगा।
‘आवाज’ और ‘जगमग’ नाम प्रकाशित बच्चों के अखबारों में अपनी रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद से अब ये बच्चे ग्रामीण इलाके की समस्याएं हो या अपने किसी साथी का उपलब्धी हर बात पर पैनी नजर रखते हैं। गुना से मासिक प्रकाशित होने वाले बच्चों के इन दो अखबारों के साथ ही अब जल्द ही शिवपुरी से भी ऐसा ही अखबार प्रकाशित होगा।
14 साल के हेंमत आवाज के लिए रिपोर्टिंग करते हैं। ग्राम सोटाया भमौरी के शासकीय हाईस्कूल में पढ़ने वाले हेमंत ने जब आवाज के माध्यम से अपनी पंचायत को बताया कि कैसे स्कू ल के रास्ते में फैली गंदगी के कारण बच्चों को परेशानी हो रही है। इस बात को गंभीरता से लेते हुए सरपंच ने न सिर्फ रास्ता साफ कराया बल्कि उस रास्ते में कांक्रीट का भराव करवा दिया।
आठवीं के छात्र राजकुमार साहू ने अपनी कलम से लिखा कि स्कूल का काम पूरा नहीं हो पाने के कारण स्कूल में पूरी कक्षाएं एक साथ नहीं लग पा रही है। इस बारे में भी ग्राम सभा में चर्चा की गई।
भदौरा गांव के आठवीं के छात्र अतुल कुशवाह अखबार में सफाई के बारे में जागरूकता के लेख लिखने के साथ ही कविता लिखने में भी रूचि रखते हैं।
नेगमा आठवीं के छात्र द्वारका ने अपनी रिपोर्ट एक हाल ही में देखी दुर्घटना पर बनाई और लिखा कि किस तरह से शराब पीकर ट्रैक्टर चलाने वाले ड्राइवर के कारण 4 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
बच्चों की इस टीम से साथ काम करने वाले विनित सारस्वत और महेंद्र सिंह मौर्य ने बताया कि इन बच्चों की पहले से कई मामले ग्राम सभा के समाने आए और उन पर चर्चा के बाद कई काम भी हुए। महेंद्र ने बताया कि यूनिसेफ की मदद से ग्रामीण बच्चों को मखर बनाया जा रहा है।
यह हेडिंग है उन नन्हें बच्चों के अखबार की
स्वच्छ रहे स्वस्थ्य रहो: एक गांव की रिपोर्ट
स्कूल को जगमग करने में जुटी जगमग सेना
16 में से नौ हेंडपंप बंद
सबकुछ ठीक है पर बिजली नहीं - पाती मुख्यमंत्री जी के नाम
खेजरा में जल संकट
ऐसी बारीश कभी न देखी

Tuesday, October 4, 2011

मामा आपकी ‘लाड़ली’ होने की सजा मिल रही है मुझे ...




मैं जयश्री गुप्ता हूं। ढ़ाई साल पहले इस दुनिया की रोशनी से रूबरू हुई। तब पहली बार मुझे मम्मी और पापा के स्पर्श का अहसास साथ में हुआ। शायद आखिरी बार भी। उसके बाद पापा ने मुझे कभी छुआ ही नहीं। मेरे जन्म ने ही मेरे मम्मी-पापा के बंधन को कमजोर कर दिया। अपने सिर इस गुनाह का साया लिए अब मैं सिर्फ मम्मी के साथ ही रहती हूं। मेरे जन्म ने मेरी मम्मी का हर सपना चूर-चूर कर दिया। मुझे बचाने के लिए अब मम्मी दुनिया से अकेले संघर्ष कर रही है। पिछले एक साल से मैं अपनी मम्मी के साथ ‘समीरा’ आश्रम में रह रही हूं। वहां ऐसी कई दूसरी आंटियां भी हैं, जिन्हें उनके अपने घर से इसलिए बेदखल कर दिया गया क्योंकि वे इस दुनिया में लाड़ली की मां बनी।
मम्मी की गलती है कि उन्होंने मुझे जन्म दिया, यह कहते हुए मेरे पापा और दादी उन्हें अक्सर जख्मी कर देते थे। हमारे परिवार की पंरपरा ही ऐसी रही चार साल पहले मेरी ताईजी को भी इसलिए ही घर से निकाल दिया गया, क्योंकि उन्होंने भी बिटिया को जन्म दिया था। मम्मी मुझे दूध पिलाते हुए अपने शरीर पर लगे जख्मों पोंछा करती थी। एक दिन पापा ने मम्मी और मुझे जबलपुर में नानी के घर छोड़ दिया, कुछ दिन बार घर पर आए एक कागज के बाद मां और नानी जोर-जोर से रोने लगी। पता चला वो कोर्ट का नोटिस है जिसमें पापा ने मां को पागल बताते हुए उनसे तलाक मांगा है। मां ने कई बार पापा और दादी से बात करने की कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। फिर मां मुझे लेकर भोपाल आई। यहां दिनभर महिला थाने, जनसुनवाई और बड़े अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगाए कि कैसे भी पापा मुझे और मेरी मम्मी को अपना लें। कोई फायदा नहीं हुआ। हमारी कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। मैं समाज की कड़वी हकीकत से रूबरू हो गई कि, मेरी ही गलती है कि ‘मैं लड़की हूं’। सोचती हूं कि मेरी मम्मी ने जन्म से पहले यह जान लिया होता कि, उनकी कोख में लाड़ली तो है लेकिन उसे पापा और दादी का प्यार कभी मिलेगा ही नहीं तो ....क्या मैं दुनिया में आ पाती...? लेकिन जब मेरी मम्मी इन हजारों मुश्कििलों बावजूद मुझे गले लगाकर चूमती है तो मुझे दुनिया में आने की खुशी होती है, क्योंकि मेरे जैसी 16 हजार लड़कियां रोज जन्म से पहले मां की कोख में ही मार दी जाती हैं।
मैंने सुना है कि मेरे एक मामा (मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान) को मेरे जैसी किसी भी लाड़ली के जन्म से बेहद खुशी होती है, आज से वे हमारे नाम पर ‘बालिका दिवस’ मना रहे हैं। जन्म के बाद पहली बार मुझे गर्व हुआ कि ‘मैं भी लाड़ली हूं’... कब तक और किस मायने में यदि मेरी मम्मी को न्याय ही ना मिले, इसलिए कई मांए तो हमारा जन्म होने से पहले ही हमें मार देती हैं। मैं मामा से यह गुजारिश करना चाहती हूं कि मुझे और मेरी मां जैसी लाड़ली की बेदखल मांओं को न्याय मिले। उन्हें वो आसरा मिले जहां मेरे जैसी अन्य लाड़लियों का भविष्य सुरक्षित रह सके।

Monday, December 13, 2010

भूखा मध्यप्रदेश

भूमिका कलम, भोपाल

मध्य प्रदेश को स्वर्णिम प्रदेश बनाने की तैयारियों में जुटी राज्य सरकार यहां के भविष्य को सुरक्षित करना ही भूल गई। लगभग हर जिले में भूख, कुपोषण और बीमारी से बच्चों की मौत दर्ज की जा रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ही प्रदेश में औसतन 71 बच्चे रोजाना दम तोड़ रहे हैं, लेकिन इस ओर ध्यान देने वाला कोई नहीं। बच्चों के मामा होने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी तमाम योजनाओं की घोषणा के अतिरिक्त उनकी जीवन रक्षा के लिए अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए हैं। वर्ष 2009 में इंटरनेशनल फूड पालिसी रिसर्च संस्थान ने भी भारत के 17 राज्यों में कुपोषण और भूख के मामले में मध्य प्रदेश की स्थिति को चिंताजनक बताया था। 39 लाख बच्चों के कुपोषित होने की बात खुद महिला बा विकास मंत्री विधानसभा में स्वीकार कर चुकी हैं, जबकि नेशनल फैमली हेल्थ सर्वे रिपोर्ट की मानें तो 60 फीसदी कुपोषण के चलते 60 लाख से अधिक बच्चे कुपोषित हैं।

सूचकांक

मातृ मृत्यु द – 335 प्रति लाख

शिशु मृत्यु दर – 70 प्रति हजार पर

गरीबी -65 फीसदी गरीबी रेखा के नीचे

कुपोषण – 60 फीसदी से अधिक

औसत आयु – 57 वर्ष

बजट

वर्ष 2008-09

750 करोड़ – स्थाई खर्च

183 करोड़ – नई योजनाएं

600 करोड़ – एनआरएचएम

वर्ष 2009-10

844 करोड़ – स्थाई खर्च

391 करोड़ – नई योजनाएं

756 करोड़ – एनआरएचएम

हां कुपोषण से हो रही मौतें

08 मार्च 2010 को पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अनूप मिश्रा ने विधानसभा में स्वीकार किया था कि प्रदेश में विभिन्न रोगों से हर साल 30 हजार से अधिक बच्चों की मौत हो रही है और 60 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इन कुपोषित बच्चों पर मलेरिया, निमोनिया, डायरिया और मीजल्स जैसी बीमारियां जल्दी असर दिखाती हैं। वर्ष 2005-06 में 30563, वर्ष 2006-07 में 32188, वर्ष 2007-08 में 30397 और वर्ष 2008-09 में 29274 बच्चों की मौतें हुई है। मिश्रा द्वारा कुपोषण के कारणों में मां का जल्दी गभर्धारण, नवजात शिशु का कम वजन का होना, संपूर्ण टीकाकरण न होना, छह माह तक शिशु को लगातार स्तनपान न कराना, सही समय पर पोषण आहार न देना, संक्रमण होना और आर्थिक स्थिति कमजोर होना बताया है।

50 फीसदी से अधिक बजट लैप्स

महिला बाल विकास विभाग द्वारा विभिन्न योजनाएं संचालित किए जाने के वाबजूद कुपोषण से मौतें थमने का नाम नहीं ले रही हैं वहीं बच्चों के पोषण आहार संबंधी बजट का 50 फीसदी से अधिक बजट लैप्स हो रहा है। वर्ष 2009-10 में ही कुपोषण से निपटने के लिए मिले 67 करोड़ में से 37 करोड़ रुपए खर्च नहीं किए जा सके और यह राशि लैप्स हो गई। पन्ना, सतना, टीकमगढ, डिंडोरी, खरगोन, खंडवा, श्योपुर, शिवपुरी, कटनी, बडवानी और सीधी अधिक कुपोषण वाले जिले हैं।

बच्चों की मौत पर भारी है विभागों के विवाद

जिलों से आने वाली बच्चों की मौत की खबरें चौकाने वाली नहीं रही क्योंकि इन मौतों के बाद स्वास्थ्य विभाग और महिला बाल विकास एक दूसरे पर जिम्मेदारी ढोलना शुरू कर देते हैं। मौत के कारणों में स्वास्थ्य विभाग का तर्क होता है कि भूखे रहने और सही पोषण आहार नहीं मिलने के कारण बच्चों में बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं हो पाती और वे साधारण बीमारियों में ही दम तोड़ देते हैं। ऐसे ही महिला बाल विकास विभाग का तर्क होता है कि बीमारियों के दौरान उपचार की सही सुविधाएं मुहैया नहीं होने के कारण बच्चे मर रहे हैं। विशेषज्ञों की मानें तो जमीनी हालात के मुताबिक दोनों ही विभाग सही हैं, लेकिन मौत की जिम्मेदारी भी दोनों विभागों की ही है।

अव्यवहारिक योजनाएं

- कुपोषण के कारण राज्य की लगतार हो रही बदनामी के बाद अब स्वास्थ्य विभाग ने प्रदेश में एक करोड़ बच्चों को विटामिन की गोलियां देकर स्वस्थ करने की कोशिश भी की। आंगनबाडियों में दर्ज बच्चों के लिए तीन दवाओं का इंतजाम किया गया। मई 2010 में चलाई इस योजना पर विभाग ने प्रजनन शिशु स्वास्थ्य के मद से लगभग पांच करोड़ रुपए खर्च किया लेकिन नतीजा सिफर। जुलाई से अब तक हर जिले में बच्चों की लगातार मौत दर्ज की गई, क्योंकि यह दवाएं भी कुछ ही इलाकों तक पहुंच पार्इं।

- महिला बाल विकास विभाग दो साल में पांच बार आंगनबाडी में पोषण आहार का मीनू बदल चुका है लेकिन स्थिति जस की तस है। शिवपुरी जिले के हर ब्लाक में एमपी एग्रो से आने वाला पोषण आहार आंगनबाडियों के बजाय बाजार में बेचा जा रहा है। संपन्न लोगों के घरों के जानवरों का चारा बना पोषण आहार बच्चों के कुपोषण को दूर नहीं कर पा रहा है, क्योंकि कई इलाकों में दो सालों से आंगनबाडियां खुली ही नहीं है।

बंद किया बाल संजीवनी अभियान

महिला बाल विकास विभाग के आला अधिकारियों के अनुसार जो बच्चे आंगनबाड़ी में दर्ज नहीं हैं उनमें कुपोषण का स्तर अधिक होता है। सालों से चलाए जा रहे बाल संजीवनी अभियान के आंकड़ों में कुपोषण बढ़ता गया। इन आंकड़ों को रोकने के लिए भी अभियान के 13 वें चरण को नियमित कार्यक्रम बना दिया गया है।

इनका भी कोई असर नहीं

- इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च संस्थान की ताजा रिपोर्ट ने भी भूख और कुपोषण के मामले में प्रदेश की भयावह स्थिति को उजागर किया है। इस रिपोर्ट के अनुसार देश के 17 प्रदेशों में मप्र की स्थिति सबसे खराब बताई गई है।

- फरवरी 2009 में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग(एनसीपीसीआर) ने प्रदेश में कुपोषण से हुई बच्चों की मौत पर जनसुनवाई की थी। इस दौरे में आयोग की अध्यक्ष शांता सिन्हा ने प्रदेश में बच्चों के हालात पर भारी चिंता जताते हुए मुख्य सचिव और महिला बाल विकास विभाग की प्रमुख सचिव को रिपोर्ट सौंपी। जिसमें तत्काल आईसीडीएस प्रोजेक्ट को बढ़ाने और सुधारने की बात कही गई थी।

- वर्ष 2006 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार समुदाय में 6 साल से कम उम्र के बच्चों पर एक आंगनवाड़ी होना आवश्यक है। इसके बाद भी प्रदेश में बच्चों की जनसंख्या के मान से 50 फीसदी आंगनवाड़ी केंद्रों का संचालन नहीं हो रहा है।

- वर्तमान में एक लाख 26 हजार आंगनवाड़ियों की आवश्यकता है जबकि सिर्फ 68306 केंद्र ही संचालित है। 20 हजार नए केंद्र विभाग एक साल बाद भी नहीं खोल पाया है जिससे लगातार सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना हो रही है।

मध्य प्रदेश की आंगबाडियों में दर्ज बच्चे (केंद्रीय महिला बाल विकास विभाग की रिपोर्ट के अनुसार)

6 माह से 3 साल उम्र के 2052138

3 साल से 6 साल तक के 2070104

जबकि कुल बच्चे 10782214

इस मान से केवल 38.2 फीसदी बच्चे ही आंगनवाडी और अन्य योजनाओं का लाभ ले पा रहे हैं।

Sunday, December 12, 2010

पुलिस की दबंगाई ने दिया दर्द

मानव अधिकारों का खुला मजाक बने रतलाम के दंगे

भूमिका कलम, भोपाल
गुजरात में जिस तरह पुलिस पर मुस्लिमों पर अत्याचार करने के आरोप हैं, उसी तरह मप्र पुलिस और राज्य सरकार को रतलाम की मुस्लिम महिलाएं कटघरे में खड़ा कर रही है। उनके आरोप है कि पुलिस ने मानवाधिकारों का उल्लंघन किया और मुस्लिमों पर अत्याचार किए। महिलाओं-बच्चों पर इस कदर ज्यादतियां की गई कि कई घरों में महिला और बच्चियां अपना मानसिक संतुलन खो चुकी हैं।
कथित तौर पर उनके साथ जो अत्याचार हुए, उसकी मानवाधिकार आयोग ने जांच बड़े जोर-शोर के साथ शुरू की थी, लेकिन वह भी ठंडी पड़ गई। जिस प्रशासन पर अत्याचार करने के आरोप लगे, उन्हें हीं जांच सौंप दी गई। यहां तक की यहां तक कि एसपी मयंक जैन पर भी उन्होंने गंभीर आरोप लगाए हैं।
तीन सिंतबर 2010 की रात को शुरू हुए इन दंगों के शिकार लोगों को लंबे समय तक जेल में रखा गया जिसमें ईद मानाने अपने घर पहुचें छात्र और बीमार महिलाएं भी शामिल हैं। मानव अधिकारों की बात तो दूर अभी तक किसी को न्याय नहीं मिला और आज भी पीड़ा दे रही है पुलिस की दंबागाई।
आज भी होती है खून की उल्टियां ...
" मेरी सा को पुलिस ने बाल पकड़कर सड़क पर पटक दिया। जब मैंने रोकने की कोशिश की तो मुझे भी मारा और बोले कि अब तो यहाँ दूसरा गुजरात बना देंगें और ज्यादा बोली तो तेरे आदमी की जगह तेरे साथ बिस्तर पर हम होंगे। उन्होंने मुझे मारा। मुझे खून की उल्टियां हो रही थी और एसपी साहब बाहर खड़े गालियां दे रहे थे कि मारो इन .... को। " रतलाम निवासी रानी-बी चार महीने पहले हुए दंगों को याद करती ही है तो उसकी रूह कांप जाती है। इन अत्याचार के बावजूद मानव अधिकारों की दुहाई देने वालों से कोई न्याय नहीं मिला।
वो बच्चों के शोर से डर जाती है ...
रतलाम के शेरनी पूरा में रहने वाली 18 साल की आफरीन पिता इकराम खान चार महीने बाद भी कुछ बोलने की हालत में नहीं है, बच्चों के खेलने के शोर से भी सहमने वाली आफरीन ने घर के अंधेरे कोने को ही अपना आशियाना बना लिया है। आफरीन की मां ने बताया कि जिस वक़्त ये हादसा हुआ आफरीन सोफे बेठी थी। अचानक घर के शीशे टूटने शुरू हुए...पुलिस के दो लोग घर का दरवाज़ा तोड़ कर अन्दर घुसे उन्होंने मेरे शौहर और बेटे को बन्दूकों से इतना मारा कि घर में खून के सिवा कुछ नज़र ही नहीं आ रहा था...हम रो रहे थे और पुलिस मार रही थी।


वो छह दिन भूखे सोए थे हम...
शनिवार के उस दिन याद करके 17 साल की समरोज की आंखे आज भी भीग जाती है। उसके अनुसार गली में आ रही तेज आवाज के कारण हमने दरवाजा नहीं खोला तो पुलिस ने दरवाजा तोड़ा और पापा को घर से घसीटते हुए ले गए। मैंने उनकी मन्नतें की तो मेरा दुप्पटा खींचा और मुझे छुने की कोशिश की। कोई कसूर नहीं होने के बाद भी छह दिनों तक पुलिस ने पापा को हिरासत में रखा। इन दिनों हमारे यहां चूल्हा नहीं जला हम भूखे ही सो सोए थे। इस अत्याचार की कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई और कोई न्याय नहीं मिला।


दो महीने चंदे पर जी हूं....
"बिना गुना मेरे शौहर को दो महीने जेल में रखा और मुझे इतना पीटा की आज भी पेट में तकलीफ है। दो महीने मैं चंदे पर ही जी हूं क्योंकि कोई सहारा नहीं है हमारा। 43 साल की अख्तर बी इस वाकये को बताते हुए अपने दर्द को हरा कर रही थी। उन्होंने बताया कि घर में घुसकर पुलिस ने मुझे और मेरे शौहर को बेतहाशा पीटा और उसे अपने साथ ले गए। मुझे बेहोशी की हालत में छोड़ बाहर से दरवाजा लगा गए। एक दिन बाद पड़ोसियों ने दरवाजा खोल के बाहर निकाला और अस्पताल में दाखिल करवाया। "

Thursday, December 9, 2010

" मैं डायन नहीं हूं... मरे को नहीं जिला सकती "

एक हल्का जख्म हमें कई दिनों तक बैचेन कर देता है, फिर जरा उस महिला की सोचिए जिसके माथे पर बड़ा चीरा लगाकर उसमें चावल का चूरा और कुमकुम एक महीने तक भरा गया हो। सेंधवा मझोली ब्लॉक की रामकली को दो साल पहले टुहनी (डायन) करार देकर जबरन सल्फास घोलकर पिलाने की कोशिश भी की गई। कारण सिर्फ इतना था कि देवर के 8 साल के बेटे की मौत होने पर उसे रामकली को शव के सामने बिठाकर बच्चे को जीवित करने के लिए कहा गया। उसने कई मिन्नतें की कि मैं डायन नहीं हूं मरे को नहीं जिला सकती पर किसी ने उसकी नहीं सुनी और उसे डायन होने की प्रताड़ना झेलनी पड़ी। आज भी उनकी जमीन पर देवर बच्चू सिंह और अजय सिंह ने कब्जा कर लिया है। अपनी अजिविका के लिए भटक रही रामकली को आज भी न्याय नहीं मिला क्योंकि पुलि ने एफआईआर दर्ज करने के बाद भी पूरे मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं किया।


मप्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भले ही आदिवासी सम्मान यात्रा निकालें, गौरव दिवस मानाएं या महिलाओं के उत्थान की घोषणाएं करें, यहां न सिर्फ महिलाओं पर प्रताड़ना जारी है बल्कि न्याय के लिए दर दर भटकती महिलाओं में सिर्फ अनपढ़ या आदिवासी वर्ग की नहीं पढ़ी लिखी संपन्न घरों की महिलाएं भी शामिल हैं। जागरूकता के बाद भी नियमों की कमजोर कड़ी के कारण महिलाओं को न्याय मिलना आज भी दूर की कौड़ी है।
राजधानी के गांधी भवन में आयोजित जनसुनवाई में दिल को दहला देने वाली प्रताड़ना झेल चुकी महिलाओं ने जब अपने अनुभव बताकर घावों को हरा किया तो बैठे लोग आंसू नहीं रोक पाए। सम्मान के साथ जीवन का अधिकार मांग रही आधी आबादी के लिए जीवन के वो पल ही बेहद कठीन हो रहे हैं जब उन्हें अपनों से ही प्रताड़ाना मिल रही हो। ऐसे मामलों में न तो महिलाओं को न्याय मिला ना ही पुलिस प्रशासन से कोई मदद। आशना महिला अधिकार संर्दभ केंद्र, एक्शन एड और जनपहल द्वारा कराई गई जनसुनवाई में महिलाओं के अधिकारों पर खासी चर्चा हुई।

दबंगो ने करार दिया डायन
सिधी जिले कुसमी ब्लॉक की लीलावति यादव अपने पूर्व सरपंच से इसलिए प्रताड़ित की गई क्योंकि उसने बंधुआ मजदूरी का विरोध किया। इस विरोध की सजा में सरपंच हुबलाल सिंह ने उसे बलात्कार करने की कोशिश की और बाद में पंचायत के समाने उसे डायन करार दिया। गांव वालों ने भी लीलावति को उसके तीन साल के बच्चे सहित जिंदा जमीन में गाड़ दिया। जद्दोजहद के साथ लीलावति ने अपनी जान तो बचा ली लेकिन अभी भी उसके परिजन जमीन हड़पने के लिए उसे अभी भी डायन कहकर तंग कर रहे हैं। इसमें पुलिस ने लीलावति की कोई मदद नहीं की।
पढ़े लिखे पति और देवर भी मारते हैं
दमोह में एक निजी स्कूल में शिक्षिका के पद पर कार्यरत पुष्पलता बाजपेयी की कहानी दर्दनाक है और वे किसी से इसे बताते ही रो पड़ती हैं। उनके अनुसार आठ साल के बेटे के सामने न सिर्फ उनके पति और देवर उन्हें पीटते हैं बल्कि घर के एक कमरे में भी रहने की इजाजत नहीं देते। घरेलू हिंसा का केस दायर कर चुकी पुष्पलता ने बताया कि देवर अजय बाजपेयी वकील हैं और कानूनी बारीकियों का फायदा उठाकर उनका जीना दुभर कर दिया है। पुष्पलता को पुलिस और महिला डेस्क से भी कोई मदद नहीं मिली।
आश्रय गृह बना घर
32 साल की गीता यादव ने शादी के वक्त इसकी कल्पना भी नहीं की होगी कि जिस घर को संवारने के सपने लिए वो माता पिता का घर छोड़ रही है एक दिन उसे यह घर छोड़ आश्रय गृह में रहना होगा। पति से द्वारा मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की हद होने पर पुलिस और अदालत की शरण लेने के बाद भी गीता को न्याय नहीं मिला और वो आश्रय गृह में रहने को मजबूर है।
पेट पर चढ़कर पीटा पति ने
पन्ना जिले की अनामिका शर्मा शादी के बाद से ही घरेलू हिंसा शिकार हुई। विदाई के बाद ससुराल आते ही उसके पति ने उसके पेट पर चढ़कर उसे इस कदर पीटा कि उसकी यूरीन की थैली ही फट गई। छुपकर किसी तरह अपने पिता को फोन किया। भाई ने अमामिका को वहां से लिया और अस्पताल में भर्ती कराया। शारीरिक रूप से बेहद कमजोर अनामिका अपने मायके में रह रही है और यहां उसका इलाज चल रहा है। महिला आयोग से भी अनामिका को कोई न्याय नहीं मिला।

Thursday, December 2, 2010

प्रेमपाश


यह पंक्तियां उनके लिए, जिनसे मिलने के बाद मैंने जाना प्यार में बंधना और मुक्त हो जाना क्या है?
बंधन और मुक्ति भले ही विपरित हों लेकिन प्यार की उंचाइयां इसे एक कर देती है।

प्रेमपाश
मैं अक्सर रहती थी उनके पास
देर तक उनकी खुशबू में महकती
अपने अन्दर विचरती हुयी

क्या कहा था उन्होंने
कुछ पूछ रहे थे वे
सुनाई दे रही है कई अनकही बातें
उनके जाने के बाद भी

प्यार ऐसा होता है क्या
जब भी मैं बांधती अपनी भावनाओं का बांध
वे बाढ़ की तरह आते और कई हजार मीलों तक
बिखेर देते थे मुझे

अब मैं,
खुद में नहीं विचरती
हर खयाल उनका हो गया

क्यों
हुआ ऐसा
कई दिनों बाद
फिर एक बार
वे पल, वे बातें और ढेरों सवाल पीछे छूट गए

एक बार फिर
जीवन की नई सुबह
उनके सामने होने का सपना
सब हो गए एक साथ

वो मुस्कराते हुए आए
फिर मन के ठहरे पानी में
मार गए एक कंकर
और शुरू हो गई नई उथल-पुथल ..

Monday, November 29, 2010

बस नाम की हीरा, मोती और राजकुमारी



पढ़ने की चाह के नाम पर बस आह, पढ़ाई की उम्र में मजदूरी की मजबूरी

शोडलपुर (रायसेन) से लौटकर भूमिका कलम
उसका नाम हीरा है और उसकी सहेली का मोती। उन्हीं की एक सहेली राजकुमारी भी है और चौथी का नाम सुलेखा है। लेकिन सच कहा गया है कि नाम से क्या होता है, हीरा बनना चाहती थी डॉक्टर और मोती की आंखों में टीचर बनने के सपने पल रहे थे। आज दोनों ही मजदूरी कर रही हैं। राजकुमारी और सुलेखा के भी भविष्य के सपने चूर-चूर हो चुके हैं और उनके हिस्से भी मजदूरी का काम ही आया है। दुर्भाग्य देखिए कि इनमें से हर किसी को मजबूरी के चलते स्कूल छोड़ना पड़ा और आगे पढ़ने की इच्छा को मन में दबाए वे दो समय की रोटी की जुगाड़ में परिवार का साथ दे रही हैं। हीरा, मोती, राजकुमारी और सुलेखा जैसी 30 लड़कियों की यही दर्द भरी कहानी है।
शिक्षा का अधिकार, स्कूल चलें हम, सर्व शिक्षा अभियान और लाड़ली लक्ष्मी जैसी योजनाओं वाले मध्यप्रदेश में उक्त झकझोर देने वाली सच्चाई राजधानी से महज 125 किलोमीटर दूर रायसेन जिले के शोडलपुर गांव में देखी जा सकती है। करीब 1800 की आबादी वाले इस गांव के कमोबेश सभी परिवार भयावह गरीबी से जूझ रहे हैं, लेकिन गरीबी रेखा से नीचे बीपीएल के कार्ड महज 31 परिवारों को मिले हैं। इस गड़बड़ी ने कई युवा सपनों को रौंद दिया है। ज्यादातर परिवारों के सभी सदस्य मजदूरी करने को मजबूर हैं। महज 14 साल की उम्र में आठवीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ने वाली हीरा कहती है ह्यपिताजी की मौत के बाद घर पर पैसे का ऐसा संकट आया कि स्कूल को भूलना पड़ा।ह्ण पांचवीं कक्षा के बाद मजबूरी में स्कूल से दूरी करने वाली राजकुमारी कुशवाह की अन्य तीन बहनों को भी शिक्षा से दूर होना पड़ा है। उसकी मां आशाबाई कहती हैं कि पहले पीला कार्ड था तो कुछ अनाज मिल जाया करता था, आज कार्ड नहीं रहा। जब खाना ही नहीं मिलेगा तो बच्चियां पढ़कर भला कर भी क्या लेंगी? मोती के भाई टीकाराम की आंख यह बताते हुए भर आई कि आठवीं के बाद पैसे की कमी के चलते उसे अपनी बहन को स्कूल से अलग कर मजदूरी में लगाना पड़ गया। खेतों में मजदूरी कर रही सुलेखा विश्वकर्मा के पिताजी अपाहिज हो गए। घर में पैसा नहीं था इसलिए भाई-बहिन को पढ़ाई छोड़ कर मजदूरी में जुटना पड़ गया है।
हालात ऐसे भी
हमारी पड़ताल बताती है कि गांव के जिन 31 परिवारों को बीपीएल कार्ड दिया गया, उनमें से अधिकांश जमीनों के मालिक हैं और उनके घर पर ट्रेक्टर भी हैं। जबकि मजदूरी कर पेट पाल रहे पात्र परिवारों को यह कार्ड मिला ही नहीं है।
शोडलपुर पंचायत सचिव महेंद्र कुमार गुप्ता सफाई भरे लहजे में कहते हैं गांव में गरीबी रेखा का सर्वे हुआ था, सवाल-जवाब में जो परिवार 14 से अधिक नंबर पा गए उन्हें एपीएल और कम नंबर पाने वालों को बीपीएल कार्ड दिए गए। इस प्रक्रिया में संपन्न परिवारों को भी बीपीएल कार्ड मिल गए। दोबारा सर्वे के लिए कई बार कलेक्टर कार्यालय में अर्जी दी, लेकिन सुनवाई नहीं हो रही।

Saturday, September 25, 2010

जीवन का सौदा या शादी

राजधानी में धडल्ले से बेची जा रही नाबालिक लड़कियां भूमिका कलम
मप्र सरकार लाड़लियों के लिए भले कितनी ही योजनाएं संचालित करें, लेकिन "अगले जनम मोहे बिटीया ही किजो" धारावाहिक की "लाली" जैसी सैकड़ों नाबालिग राजधानी से दूसरे राज्यों में ब्याही जा रही हैं। ये वो लड़कियां हैं जो अपने परिवार की गरीबी दूर करने के लिए कच्ची उम्र में अधेड़ उम्र के आदमियों को महज 70 से 80 हजार रुपए में बेच दी जाती हैं। जीवन का यह सौदा शादी के लिबास में इस बखूबी से अंजाम दिया जा रहा है कि, न ब्याही जा रही लड़की को पता चलता है और ना ही माता पिता सहित परिवार के अन्य रिश्तेदारों को कोई एतराज होता है।
पड़ताल बताती है कि भोपाल के इदगाह हिल्स, बाजपेयी नगर, बैरागढ़, कोहेफिजा, 12 नंबर के आसपास की झुग्गियों से 18 साल पहले ही सैकड़ों लड़कियों का सौदा परिजनों की मर्जी से अघेड़ उम्र के आदमियों के साथ राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों में किया गया है। यहीं की कुछ महिलाओं की दलाली के कारण यह प्रक्रिया कुछ सालों से जारी है। बेची गई लड़कियों की छोटी बहनों ने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि बहुत अधिक उम्र के आदमियों से बहनों की शादी हुई है लेकिन अब वे यहां कभी आती ही नहीं।
13 साल की लड़की 35 साल का दूल्हा
कोहेफिजा बस्ती में रहने वाली रूकमनी बाई ने बताया कि सात महीने पहले ही 13 साल की रेखा को 40 साल के अधेड़ के साथ ब्याह दिया गया। रेखा के पिता मजदूरी कर घर चलाते हैं और उसकी मां भी घरों में काम करती है। लेकिन 80 हजार के लालच में राजस्थान के ग्रामीण इलाके में रेखा का सौदा कर दिया गया।
शादी बन गई कैद
तीन महीने पहले 16 साल की सविता को भी उसकी मर्जी के बिना उदयपुर में एक आर्थिक समृद्ध परिवार के 39 वर्षिय आदमी से ब्याह दिया गया। सविता शादी के एक महीने बाद ही वहां से भागकर वापस भोपाल आ गई। इस बारे में जब उसकी मां और भाई बात करने उदयपुर गए तो आदमी ने उन्हें कैद कर जान से मारने की घमकी दी और सविता के बदले दिए गए 70 हजार रुपए वापस मांगे। परिजनों ने सविता को वापस उसी माहौल में भेज दिया।
अपनी बाहदुरी से बची पूनम
शराबी पिता के नशे की भेंट चढ़ने से 16 साल की पूनम अपनी बाहदुरी के कारण बच गई। इदगाह हिल्स के आसपास बनी झुग्गियों में रहने वाली पूनम जब घर पहुंची तो छोटी बहन से पता चला कि उसकी 42 साल के अधेड़ से तय की गई है। पूनम ने शादी के एनवक्त पर ही हंगामा खड़ा कर मना कर दिया।
बहनों की शादी से बेखबर रही गनूजा
14 साल की गूंजा अपनी दो बड़ी बहनों की शादी से एकदम बेखबर है, क्योंकि उसके सामने तो शादी हुई ही नहीं। माता- पिता बहनों को वैष्णव देवी लेकर गए और उसके बाद बहनें घर नहीं आईं।

Tuesday, August 17, 2010


खामोश रात ...
आज की रात उन बहुत सी रातों से अलग
ज्यादा खामोशी के साथ मेरे मन पर
उनके होने की दस्तक लगातार बार-बार
चांद भी नहीं था यहां रोशनी के लिए
आंखों की खोज जारी थी फिर भी चांदनी के लिए

मैं मन ही मन उनसे बातें करती
और जवाब देती उन सवालों के
जो कभी पूछे ही नहीं गए
अब गुत्थीयां सुलझ गई थीं
जो उलझनें बनी उनके सामने
नजर आती थी मेरे चेहरे पर

एक नहीं कई बार ऐसा ही हुआ
और आंखों ही आंखों में रात गुजर गई...